Category Archives: Health

पांच लाख खर्च, फिर भी मच्छर जिंदा

वायरल, डेंगू और चिकनगुनिया से निपटने के लिए नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग हर कारगर कोशिश करने का दावा कर रहा है, लेकिन धरातल पर स्थिति कुछ ओर ही है। नगर निगम का कहना है कि मच्छरों को खत्म करने के लिए की गई फॉगिंग पर अब तक पांच लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। वहीं मैलाथियान का असर मच्छरों पर नहीं हो रहा है और लोग डेंगू, चिकनगुनिया  की चपेट में आ रहे हैं। वहीं नगर स्वास्थ्य विभाग प्रतिदिन शहर के छह वार्डों में फागिंग के दावे कर रहा है। ऐसे में साफ है कि पूरे शहर में एक माह के भीतर केवल दो बार ही फागिंग हो सकती है।

ये हैं निगम के संसाधन
बड़ी मशीनें –  तीन
छोटी मशीनें – 15
प्रतिदिन काम करने वाले कर्मचारी –  40

एक लीटर मैलाथियान में 20 लीटर डीजल
नगर निगम स्वास्थ्य विभाग के अनुसार एक लीटर मैलाथियान दवा में कम से कम 20 लीटर डीजल मिलाकर छिड़काव किया जाता है। मशीन से दवा के साथ धुएं के रूप में उड़ता दिखाई देने वाला डीजल ही है। जो मच्छरों पर सीधे अटैक करता है।

मच्छरों के लिए ब्लीचिंग पाउडर भी खतरनाक
नगर निगम स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आरएस चौहान का कहना है कि मच्छरों को मारने के लिए जितना जरूरी मैलाथियान है उतना ही जरूरी डीजल और ब्लीचिंग पाउडर भी है। एक माह के भीतर शहर में कूड़ा घर और अन्य गंदगी वाले स्थानों पर ब्लीचिंग पाउडर के इस्तेमाल पर गौर करें तो 180 बोरों का इस्तेमाल किया जाता है। एक बोरे की कीमत 400 रुपये बताई जा रही है। यानी एक माह के भीतर लगभग 72 हजार रुपये का ब्लीचिंग पाउडर खर्च हो चुका है। एक लाख 26 हजार रुपये से 250 लीटर मैलाथियान की खरीद की गई।

महापौर करा रहे फॉगिंग
महापौर हरिकांत अहलूवालिया को मलेरिया हुआ तो वह फागिंग मशीन लेकर सड़क पर आ गए। लगातार 20 दिन से वह शहर के मुख्य मार्गों पर अपने सामने ही फागिंग करा रहे हैं, लेकिन मच्छरों पर इसका कोई खास असर नहीं हो रहा है।

नारियल तेल का इस्तेमाल इन स्थितियों में कभी नहीं करना चाहिए

त्वचा पर

कई लोग ड्राय स्कीन की समस्या को दूर करने के लिए रात में नारियल का तेल लगाकर सोते हैं। इसमें कोई दा राय नहीं कि नारियल का तेल प्राकृतिक मॉश्चरायजर है जिसके कारण लोग नहाने के दौरान और नहाने के बाद भी ड्राय स्कीन की समस्या से बचने के लिए नारियल का तेल लगाते हैं। अगर आप जल्दी में है या आपकी ऑयली स्कीन है तो इसका इस्तेमाल ना करें। क्योंकि नारियल तेल को अच्छी तरह त्वचा में रब नहीं करने से वो त्वचा के ऊपर ग्रीस की तरह इकट्ठा हो जाता है।

वजन कम करने के समय

अगर आप वजन कम कर रहे हैं और कैलोरी व फैट से दूर रहने के लिए सरसों तेल की बजाय नारियल तेल में खाना बना रहे हैं तो ऐसा ना करें। हेल्थ एक्स्पर्ट्स की राय में वजन कम करने के दैरान नारियल तेल का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। कई लोगों का मानना होता है कि नारियल तेल कमर कम करने में काफी मददगार है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं। केवल नारियल तेल अन्य तेलों की तुलना में ज्यादा हेल्दी है। एक चम्मच नारियल तेल में 117 कैलोरी होती है जिस कारण इसकी तुलना ऑलिव ऑयल से की जाती है। तो अगर आप वजन कम करने के लिए सरसों तेल या रिफाइन तेल के बजाय नारियल तेल में खाना बना रहे हैं तो ऐसा ना करें। बल्कि कुछ दिन के लिए फ्राई खाने की जगह उबला हुआ खाना खाइए।

टूथपेस्ट की जगह

कई बार दांतों को साफ करने के लिए लोग दांतों में तेल लगाने की हिदायत भी देते हैं। गांवों में तो कई लोग सरसों तेल और नमक मिलाकर दांत साफ करते हैं। पुराने आयुर्वेदिक उपचार में भी दावा किया गया है कि दांतों में तेल लगाने से दांत हेल्दी बने रहते हैं। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लीनिकल पैडरिएटिक डिसग्रेस के अनुसार फ्लोराइड और हर्बल उत्पाद मुंह के बैक्टीरिया को कम करते हैं ना कि किसी भी तरह का तेल। तो अगर आप रात में टूथब्रश नहीं करते तो केवल कुल्ली करना ही काफी है। जबकि तेल का इस्तेमाल दांतों की सफेदी को कम कर देता है।

कटी हुई त्वचा में

आपने कई बार देखा होगा कि लोग जली हुई त्वचा से राहत पाने के लिए नारियल का तेल लगा लेते हैं। लेकिन ये गलत है। न्यू यॉर्क के माउंट सिनाई हॉस्पीटल के डर्मेटॉलॉजी विभाग के कॉस्मेटिक एंड क्लीनिकल रिसर्च के डायरेक्टर जोशुआ ज़िनर कहते हैं कि जली या कटी हुई त्वचा पर नारियल तेल लगाने से पहले ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि जब नारियल तेल जली हुई, या किसी भी तरह की कटी हुई, खरोंची हुई और घाव से ग्रस्त त्वचा के संपर्क में आती है तो ये स्कीन इरिटेशन, लालिमा और इचिंग का कारण बनती है।

सनस्क्रीन की जगह

कई लोग धूप में बाहर निकलने से पहले सूर्य की किरणों से बचने के लिए सनस्क्रीन की जगह नारियल तेल लगाते हैं। और ये सच भी है कि नारियल तेल में कुछ ऐसे तत्व भी होते हैं जो यूवी किरणों से बचाते हैं। कई शोधकर्ताओं ने तो दावा भी किया है कि नारियल के तेल का एसपीएफ 8 होता है। लेकिन शोधकर्ताओं ने साथ में ये भी कहा है कि इसका मतलब ये नहीं हो जाता कि आप इसे सनस्क्रीन की जगह इस्तेमाल करें। क्योंकि धूप से बचने के लिए 30 एसपीएफ वाले सनस्क्रीन की जरूरत होती है जबकि नारियल का एसपीएफ केवल 8 है।

 

न मोटे होंगे न पतले, साइड इफेक्ट होंगे तगड़े

mote ko dubla
फाइल फोटोPC: अमर उजाला
स्लिम एंड फिट रहने की चाहत किसे नहीं होती। इसके लिए हेल्थ क्लब और तमाम सप्लीमेंट पर हर माह हजारों रुपये फूंक दिए जाते हैं। लेकिन यही चाहत उनकी सेहत को खतरे में डाल रही है। एफडीए और फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने अभी तक किसी ऐसी दवा या सप्लीमेंट को मंजूरी नहीं दी है, जो मोटापा कम करने के दावे पर खतरा उतरे। इसके बावजूद बाजार में चंद हफ्तों में पांच से आठ किलो वजन कम करने के दावे करते हुए धड़ल्ले से फूड सप्लीमेंट्स बेचे जा रहे हैं। जांच रिपोर्ट में इनके तमाम ऐसे साइड इफेक्ट सामने आ रहे हैं, जो अच्छे खासे स्वस्थ व्यक्ति को बीमार बना रहे हैं। एफडीए ने अब इन पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है।
सैंपल हो गए फेल
खाद्य एवं औषधि सुरक्षा विभाग (एफडीए) ने एक साल में 27 फूड सप्लीमेंट्स के सैंपल भरे। जिसमें शरीर मोटापा घटाने वाले पांच सप्लीमेंट्स, जबकि बाकी सभी सप्लीमेंट्स वजन बढ़ाने व बॉडी बनाने के दावे के साथ बाजार में बेचे जा रहे थे। अब रिपोर्ट चौंकाने वाली हैं, क्योंकि वजन घटाने के लिए बेचे जा रहे सभी सैंपल फेल हुए हैं। उनके अंदर ऐसे खतरनाक केमिकल पाये गए हैं जो सीधे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। वहीं, बॉडी बनाने के लिए बेचे जा रहे 22 में से 21 सैंपल फेल हो गए हैं। इनमें भी अधिकांश के अंदर स्टेरॉयड पाया गया।

अनानास के कंटेंट में दवाएं
एफडीए की जांच में साफ हुआ है कि ब्रोमेलैन में कुछ ऐसी दवायें मिलायी जा रही है, जिससे भूख कम लगती है। इसमें कई एंटीबायोटिक व एंटी एलर्जी वाली दवाएं भी पाई गई है। एफडीए के अभिहित अधिकारी वीके वर्मा का कहना है कि ब्रोमेलैन अनानास के रस से तैयार होने वाला एक कंटेंट है। सामान्य तौर पर इस कंटेंट का इस्तेमाल शरीर में सूजन कम करने के लिए किया जाता है। खासकर सर्जरी के बाद चिकित्सक द्वारा ब्रोमेलैन के साल्ट की गोली दी जाती है, क्योंकि ब्रोमेलैन बनाने में भी कुछ केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे ज्यादा मात्रा में दिये जाने के बाद कई सारे खतरे हैं। खासकर उल्टी, दस्त से लेकर शरीर में एलर्जी तक की शिकायत हो सकती है।

मोटापा घटाने की दवा और दुष्प्रभाव
– ओर्लिस्टेट – यह पेट के अंदर वसा का स्तर कम करती है
साइड इफेक्ट –  पेट में दर्द, अकड़न व दस्त लगना। ज्यादा समय तक सेवन करने पर पेट में अल्सर व लीवर में इंफेक्शन का खतरा।
– बेल्विक – सेवन करने पर भूख कम कर देती है।
साइड इफेक्ट – उल्टी दस्त, चक्कर आना, सिर में दर्द। पेट में इंफेक्शन होने का खतरा।
– फेंटर्मिन – यह दवा सीधे भूख को कम कर देती है।
साइड इफेक्ट – बीपी बढ़ना, अचानक से घबराहट होना, हार्ट अटैक का खतरा।
– सैक्सएंडा – इसके सेवन से पेट भरे होने का अहसास होता। भूख पहले से कम लगती है।
साइड इंफेक्ट – कुछ समय के बाद उल्टी व चक्कर आने की शिकायत। स्किन इंफेक्शन से लेकर पेट में अल्सर होने तक का खतरा।

अब आयुर्वेद का फंडा
बीते साल एफडीए द्वारा भरे गए फूड सप्लीमेंट्स के 98 फीसदी तक सैंपल फेल हुए। ऐसे में कंपनियां अब दावा कर रही है कि यह प्रोडक्ट 100 फीसदी आयुर्वेदिक है। पैकेजिंग पर लिख भी रही हैं। क्योंकि एफडीए को आयुर्वेद प्रोडक्ट का सैंपल भरने का अधिकार नहीं है। जबकि ये सभी फूड प्रोडक्ट की श्रेणी में आते हैं।

Meditation or vacation? Here’s what is better

Researchers have been using a rigorous study design to assess the biological impact of meditation as compared to going on a vacation.

Examining the effect of meditation on gene expression patterns in both novice and regular meditators, they found that a resort vacation provides a strong and immediate impact on molecular networks associated with stress and immune pathways, in addition to short- term improvements in well-being, as measured by feelings of vitality and distress.

A meditation retreat for those, who already used meditation regularly, was associated with molecular networks characterized by antiviral activity.

The molecular signature of long-term meditators was distinct from the non-meditating vacationers.

The study involved 94 healthy women, aged 30-60. Sixty-four women were recruited who were not regular meditators.

Participants stayed at the same resort in California for six days, and randomized so that half were simply on vacation while the other half joined a meditation training program for Well Being.

The meditation program included training in mantra meditation, yoga, and self reflection exercises.

For greater insight into the long-term effects of what scientists dubbed the “meditation effect” compared to the “vacation effect,” the team also studied a group of 30 experienced meditators who were already enrolled in the retreat that week.

Researchers collected blood samples, and surveys, from all participants immediately before and after their stay, as well as surveys one month and ten months later.

Eric Schadt, the senior author said, “In the spirit of other research efforts we have pioneered with other groups, this work underscores the importance of studies focused on healthy people. By combining an interrogation of gene networks with advanced data analysis and statistics, we have generated clinically meaningful information about stress and aging that is relevant to the broader population.”

The research team examined the changes in 20,000 genes to determine which types of genes were changing before and after the resort experience.

Scientists performed an integrative transcriptomic analysis, comparing gene expression networks across all three groups of participants and finding unique molecular profiles and pathway enrichment patterns.

Study results show that all groups, novice meditators, experienced meditators, and vacationers had significant changes in molecular network patterns after the week at the resort, with a clear signature distinguishing baseline from post-vacation biology.

The most notable changes in gene activity were related to stress response and immune function.

Researchers also assessed self-reported measures of well being.

While all groups showed improvements up to one month later, the novice meditators had fewer symptoms of depression and less stress much longer than the non-meditating vacationers.