सर्वोत्तम स्कूल के चयन से पहले 4 बातें जिसका ख्याल हर अभिभावक को रखना चाहिए

अपने बच्चे के लिए एक बढ़िया स्कूल ढूंढना किसी भी पेरेंट्स के लिए एक मुश्किल काम होता है . खास करके मुंबई जैसे शहर में जहाँ रोज नए स्कूल खुलते हैं . फिर ऐसी कौन सी बातें हैं जो इन स्कूलों को एक दूसरे से अलग बनाती हैं ?वो कौन से पैमाने हैं जिनके दम पर किसी स्कूल का चयन करना चाहिए ?

ये हैं वो 4 बातें जो स्वाति के हिसाब से हर पेरेंट्स को ध्यान में रखने चाहिए कोई भी प्रीस्कूल चुनने से पहले .

 #1. टीचर ट्रेनिंग: टीचर ट्रेनिंग उनके लिस्ट में सबसे पहले आता है क्योंकि ये टीचर्स ही होते हैं जो बच्चों की ज़िन्दगी बनाते हैं उन्हें अलग-अलग सांचे में ढालते हैं . स्कूल घर के बाद दूसरी जगह होती है जहाँ बच्चा सबसे पहले जाता है और ये टीचर्स ही हैं जो उसे कम्फर्टेबल फील करवाते हैं . इतनी छोटी उम्र में बच्चे अपनी देखभाल के लिए माँ जैसे ही किसी शख्श के तलाश में होते हैं . इसीलिए टीचर ट्रेनिंग सबसे ज्यादा जरुरी है .  टीचर को इस बात का अच्छे से अंदाज़ा होना चाहिए की बच्चा अपने पेरेंट्स से पहली बार दूर आया है ऐसे में उसके अन्दर अलग होने की एंग्जायटी को कैसे हैंडल करना है . उन्हें बच्चों को शांत रखने में , ज्यादा स्ट्रेस न लेने में एक्सपर्ट होना चाहिए क्योंकि बच्चे इमोशनली बहुत ही नाज़ुक होते हैं .

#2. पाठ्यक्रम: किसी भी स्कूल को चुनने में उस स्कूल का पाठ्यक्रम भी अहम भूमिका निभाता है . इसीलिए मिस वत्स इसे दुसरे नंबर पर रखती हैं . वो बताती हैं की पेरेंट्स को भी पाठ्यक्रम के असली मतलब को समझना जरुरी है ? “ज्यादातर लोग पाठ्यक्रम को केवल पढ़ाई लिखाई से जोड़कर देखते हैं . लेकिन ऐसा नहीं है. आपका फोकस इस बात पर होना चाहिए की स्कूल बच्चे को क्या पढ़ाने जा रहा है और किस तरीके से पढ़ाने जा रहा है ? ध्यान वो क्या पढ़ रहे हैं पर नहीं बल्कि कैसे पढ़ रहे हैं पर होना चाहिए .”

“पुराने टाइम के हिसाब से एक ही चीज़ को 100 बार लिखना और उन्हें रटने से अब आज के टाइम में काम नहीं चलने वाला है .बच्चों में लॉजिकल थिंकिंग और क्रिएटिविटी को बढ़ावा देना जरुरी है ताकि वो खुद ही समस्याओं को बिना किसी के मदद के ठीक करना सीखें . ये ही स्किल उन्ही आगे लीडर बनाएगी . पाठ्यक्रम में स्कूल की फिलोसफी झलकनी चाहिए जिसे स्कूल खुद भी फॉलो करता हो . इसमें ये पता चलना चाहिए की स्कूल प्रोजेक्ट पर आधारित पाठ्यक्रम पर भरोसा करता है या खेले खेल में बच्चों को पढ़ाया जाता है .”

#3. सुरक्षा: सुरक्षा उनकी लिस्ट में तीसरे पायदान पर है लेकिन ये पहले पॉइंट से जुड़ा हुआ है . “मैं समझती हूँ की सुरक्षा बहुत ही ज्यादा जरुरी है . मैंने इसे पहला पॉइंट इसीलिए नहीं बनाया क्योंकि जहां ट्रेनिंग पाए टीचर्स होंगे वहां बच्चों की सुरक्षा का स्वतः ही ख्याल रखा जाएगा . जो टीचर ट्रेनिंग लेकर आते हैं उन्हें बच्चों की सुरक्षा के लिए भी ट्रेनिंग दी जाती है .” उनका ये भी मानना है की सुरक्षा केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी होनी चाहिये. स्कूल को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए :

  • भावनात्मक सुरक्षा :बच्चे के मन में किस तरह का डर है या उसके दिमाग में क्या चल रहा है और उस डर को कैसे दूर किया जाए .
  • सुरक्षित वातावरण : टीचर्स को इस मामले में हमेशा अलर्ट रहते हुए बच्चों की गिनती करते रहना चाहिए . ऐसा इसीलिए क्योंकि बच्चे कभी पीछे छूट जा सकते हैं , कहीं कोने में बैठे रह जा सकते हैं, सो जा सकते हैं . बच्चों की भावनात्मक और शारीरिक सुरक्षा के लिए टीचर्स को हमेशा तैयार रहना चाहिए .

#4. वातावरण: “बच्चे के इमोशनल हेल्थ पर आसपास के वातावरण का बहुत असर पड़ता है . जिस स्कूल में अच्छे साफ़ सुथरे क्लासरूम होंगे वहन आप देखेंगे की बच्चों की बातें सुनी जाती हैं और वो भी बातें सुनते और समझते हैं . ड्राइंग बनाने, पेंटिंग आदि जैसे साधारण से कामों से बच्चों का न सिर्फ आत्म-विश्वास बढ़ता है बल्कि वो ऐसी और भी एक्टिविटी में भाग लेने के इक्षुक होते हैं .”

इसीलिए टीचर्स से मिलने से पहले स्कूल को अच्छे से देख लेना चाहिए, उसके माहौल को उसके वातावरण को अच्छे से समझ लेना चाहिए .

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